WASTAV ME SUCH TO YEHI HAI JANAB

" बेशक कडवा ही सही मगर सच आखिर सच ही होता है और सच आपके सामने है, जी हाँ सच तो यही है जनाब "

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Madhur Bhardwaj


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आजादी अभी बाकी है…!

Posted On: 2 Jan, 2015  
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Others social issues लोकल टिकेट में

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फेसबुक: यहां मौत भी होती है लाइक…!

Posted On: 12 Jan, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

विक्रम जी सादर अभिवादन, आपका मेरे ब्लॉग पर आगमन मेरे लिए सौभाग्य की बात है! एकदम सच्ची बात कही है आपने कि पाकिस्तान की फितरत ही ऐसी है, अगर ये इस्लाम के नियमों पर चले तो दुनिया में आतंकवाद ख़त्म हो सकता है! पर न जाने कब पाकिस्तान को अक्ल आएगी और न जाने कब वो इस्लाम धर्म के नियमों को समझेगा! खैर कहा जाता है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है, क्योकि उम्मीद ही एकमात्र ऐसी डोर है जिसके सहारे इन्सान पूरी की पूरी जिंदगी गुज़ार सकता है! मगर हम लोग इसमें कर ही क्या सकते हैं सिर्फ दुआ मांगने के अलावा!बस यही कह सकता हूँ मैं कि,........ " यकीं है कि एक दिन तो समझेगा वो ज़ज्बात मेरे, दुआ है कि ऐ खुदा तू बस अपनी इनायत बनाये रखना!

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीय पीताम्बर जी, सादर प्रणाम! सर जी सबसे पहले मैं आपसे एक करबद्ध निवेदन करना चाहूँगा, कि आप मुझे मेरे नाम के साथ जी लगाने के स्थान पर बेटा कह कर पुकारेंगे तो मुझे अत्यंत ही प्रसन्नता होगी! क्योकि मुझे पूरा यकीन है कि मैं आपके बेटे की उम्र का ही होऊंगा और आप मेरे पिता की उम्र के! तो आप मेरे लिए पिता तुल्य या चाचा तुल्य ही हुए! बच्चे अपने बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त करने के अभिलाषी होते हैं न कि बड़ो को आशीर्वाद देते हैं! मान्यवर "कब्र का कर्ज" के माध्यम से मैंने सिर्फ और सिर्फ छाम्मे खान के परिजनों के मन के वेदना को आप सभी के समक्ष रखने का प्रयास करने के साथ साथ पडोसी मुल्क पाकिस्तान की छोटी सोच, और उसकी असलियत को सामने लाने का प्रयास किया है! हालाँकि मैं कुछ अच्छा नहीं लिख सका हूँ फिर भी आपके द्वारा कहे गए शब्द "कब्र का कर्ज ,पढ़कर अछा नहीं बहूत अच्छा लगा. मैं आपको याद रखूंगा" को पढ़कर मुझे प्रतीत होता है कि मैं अपने प्रयास में काफी हद तक सफल हुआ हूँ! आपके शब्दों से मुझे अत्यंत ही प्रोत्साहन मिला है, और मैं आशा करता हूँ कि निकट भविष्य में भी मुझे इसी प्रकार आपके प्रोत्साहन रुपी शब्दों का आशीर्वाद मिलता रहेगा! साभार सहित आपके आशीर्वाद का अभिलाषी, मधुर भारद्वाज

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

भाई आस्तिक जी सादर नमस्कार, स्वागत है आपका, आपका हार्दिक आभार जो मेरा लिखे व्यक्तिगत विचार आपको पसंद आये! मैंने आपका लेख पढ़ा पड़कर बहुत अच्छा लगा, mera लेख तो आपके समक्ष कहीं भी नहीं ठहरता, मगर एक बात मेरी समझ में नहीं aayi कि, माँ कहीं तू ईश्वर तो नहीं है, टाइटिल समझ में नहीं आया, आप लिख सकते थे माँ तू ही ईश्वर है तो शायद अधिक बेहतर होता, वैसे अन्यथा न ले क्योकि मुझे लेखन की कोई अधिक समझ नहीं है, ये तो मुझे लगा कि यह होता तो और भी अच्छा होता! क्योकि माँ का स्थान तो ईश्वर से उपर है तभी तो ईश्वर भी माँ के आँचल की खातिर तरसता है! क्षमा करे बड़े भाई ऐसा कहने कि ध्रष्टता जो कर रहा हु कि आप लेख का नाम रखने में शायद भर्मित हुए हैं! अगर आपके मन को ठेस पहुंचाई हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ! आपका छोटा भाई

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

के द्वारा: jlsingh jlsingh

भाई मोहिंदर जी, सादर अभिवादन, आपने मेरा लेख पढ़ा और उस पर अपने विचार व्यक्त किये, मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुयी! आपने मेरे लेख में जो कमी बताई मैंने उसे दूर कर दिया है और अपने लेख को संशोधित लेख के रूप में पुनः अपडेट कर दिया है! आप इस पर एक बार पुनः अपनी नज़र डालें! भाई साहब, आपका कथन है कि कार्यरत महिलाओं के पास जब नाश्ता करने का समय नहीं होता तो वो यह सिंगार कहां धारण करेंगी! यहाँ मैं आपसे सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि जब कार्यरत महिलाओं के पास ब्यूटी पार्लर में जाकर खुद को हसीन दिखने के लिए समय है तो श्रंगार करने के लिए समय क्यों नहीं है.....? क्या मांग में सिन्दूर भरने और गले में मंगलसूत्र धारण करने में इतना अधिक वक़्त लगता है कि महिला यह दो छोटे से प्रतीक चिन्ह भी धारण नहीं कर सकती! आपने कहा कि जीवन आज भाग दौड़ का एक खेल हो गया है और किसी के पास यह सोचने का समय नहीं है कि क्या तर्क सांगत है, क्या नहीं.... इससे मैं पूरी तरह से सहमत हु मगर फिर भी यह कहूँगा कि भले ही जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो जाये मगर एक महिला अपने प्रतीक चिन्हों को धारण करने, अपने बनाव श्रृंगार के लिए वक़्त ओ निकल ही लेती है! मगर यह वक़्त वही महिला निकल सकती है जो कि वक़्त निकालना चाहे! आप यह न समझे कि मैं आपसे तर्क करने का दुस्साहस कर रहा हूँ, यह तो मेरे मन में उमड़ते हुए सवाल हैं जिनका जवाब पाने की मंशा से मैं इन्हें आपसे कर रहा हूँ. कृपया इन्हें अन्यथा न लें...और निकट भविष्य में भी इसी प्रकार अपने विचार व्यक्त करते रहें! सादर धन्यवाद्!

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

भाई योगी जी सादर अभिवादन, आपने मेरे लेख का अवलोकन कर जो दुःख अपने अंतर्मन में महसूस किया, मैंने बस उसी दुःख को प्रकट करने हेतु ही इसे नहीं लिखा है! मैं चाहता हूँ की हम सब मिलकर माँ गंगा को बचने के लिए अपने लेखन के माध्यम से ही एक मुहिम चलाये जिससे संभव है कि शायद हम लोग अपनी इस जीवन दायिनी माँ को बचाने के लिए कुछ प्रयास कर सकें! अतः मैं आपसे सभी लेखक बंधुओं से आग्रह करता हूँ कि आप सभी अपने- अपने प्रयास जारी रखें! एक पुत्र होने के नाते यह हमारा फ़र्ज़ भी तो बनता है! मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि मुझ जैसे नए और नासमझ लेखक के लेख को आपने पसंद किया, लेख को पसंद करने के लिए आपका सादर आभार व्यक्त करता हूँ! धन्यवाद्!

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ……….आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार… यह खेल चले दो तीन महीने लगातार…. फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार….. डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार….. फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार…… तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार….

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

के द्वारा: appy appy




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